| उगिच का कांता
गांजिता दासी
दीना ॥ व्यापुनिया सारी धरणी । मूर्ति आपुली या नयनी खेळते पहा दिनरजनी । तेवि हृदय मंचकि लीना ॥ |
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| गीत | - | श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर | ||
| संगीत | - | श्रीपादकृष्ण कोल्हटकर | ||
| स्वर | - | बालगंधर्व | ||
| नाटक | - | संगीत मूकनायक (१९०१) | ||
| राग | - | काफी (नादवेध) | ||
| चाल | - | ’इडू इडू इडू करुणा नारायणा’ | ||
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