| काय पुरुष चळले
बाई । ताळ
मुळीं उरला
नाहीं । धर्म-नीति शास्त्रें पायीं । तुडविती कसे हो ॥ साठ अधिक वर्षें भरलीं । नातवास पोरें झाली । तरिहि नव्या स्त्रीची मेली । हौस कशि असे हो ॥ घोडथेरड्यांना ऐशा । देति बाप पोरी कैशा । कांहि दुजी त्यांच्या नाशा । युक्ति कां नसे हो ॥ शास्त्रकुशल मोठे मोठे । धर्म-गुरुहि गेले कोठे । काय कर्म असलें खोटें । त्यांस नच दिसे हो ॥ |
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| गीत | - | गोविंद बल्ल्लाळ देवल | ||
| संगीत | - | गोविंद बल्ल्लाळ देवल | ||
| स्वर | - | बालगंधर्व | ||
| नाटक | - | संगीत शारदा (१८९९) | ||
| राग | - | पिलू (मूळ संहिता) | ||
| ताल | - | त्रिताल | ||
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