| कधिं करिती
लग्न माझें
तुज ठावें ईश्वरा
॥ वाढली उंच ही किती । हंसुनि बोलती । नाक मुरडिती । स्त्रिया परभारां ॥ मैत्रिणी वदति टोंचुनी । शब्द ते मनीं । जाति भेदुनी । सुरीच्या धारा ॥ जनक तो नांव काढिना । माय सुचविना । हौस मग कुणा । कोण झटणारा ॥ |
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| गीत | - | गोविंद बल्ल्लाळ देवल | ||
| संगीत | - | गोविंद बल्ल्लाळ देवल | ||
| स्वर | - | ??? | ||
| नाटक | - | संगीत शारदा (१८९९) | ||
| चाल | - | ’सखयांनो दाखवा गे’ | ||
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