| अगदिंच तूं
वेडी । वयांत या अविचार मदादिक पुरुषां बहु खोडी ॥ बघसि न दूरवरी । स्वयंमन्य ते, व्यसनी चंचल, बोधाचे वैरी ॥ म्हणसी मी शहाणी, सांग टाकिल्या अशा पिशांनीं रडति किती तरुणी ॥ |
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| गीत | - | गोविंद बल्ल्लाळ देवल | ||
| संगीत | - | गोविंद बल्ल्लाळ देवल | ||
| स्वर | - | ??? | ||
| नाटक | - | संगीत शारदा (१८९९) | ||
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