| केळीचे सुकले
बाग, असुनिया
पाणी कोमेजलि कवळी पाने, असुनि निगराणी अशि कुठे लागली आग, जळति जसे वारे कुठे तरी पेटला वणवा, भडके बन सारे किती दूरचि लागे झळ, आंतल्या जीवा गाभ्यातिल जीवनरस, सुकत ओलावा किती जरी घातले पाणी, सावली केली केळीचे सुकले प्राण, बघुनि भवताली |
||||
| गीत | - | आ. रा. देशपांडे ’अनिल’ | ||
| संगीत | - | यशवंत देव | ||
| स्वर | - | उषा मंगेशकर | ||
|
||||