| गुंतता हृदय
हे कमलदलाच्या
पाशी हा प्रणयगंध परिमळे तुझ्या अंगाशी या इथे जाहला संगम दो सरितांचा प्राक्तनी आपुल्या योग तिथे प्रीतीचा अद्वैत आपुले घडता या तीर्थाशी दुर्दैवे आपण दुरावलो या देही सहवास संपता, डागळले ऋण तेही स्मर एकच तेव्हा सखये निज हृदयाशी |
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| गीत | - | वसंत कानेटकर | ||
| संगीत | - | पं. जितेन्द्र अभिषेकी | ||
| स्वर | - | रामदास कामत | ||
| नाटक | - | मत्स्यगंधा (१९६४) | ||
| राग | - | खमाज (नादवेध) | ||
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