| अर्थशून्य भासे
मज हा कलह जीवनाचा
धर्म न्याय नीति सारा खेळ कल्पनेचा ध्यास एक हृदयी धरुनी स्वप्न रंगवावे वीज त्यावरी तो पडुनी शिल्प कोसळावे ! सर्वनाश एकच दिसतो नियम या जगाचा |
||||
| गीत | - | वसंत कानेटकर | ||
| संगीत | - | पं. जितेन्द्र अभिषेकी | ||
| स्वर | - | आशालता वाबगावकर | ||
| नाटक | - | मत्स्यगंधा (१९६४) | ||
| राग | - | भटियार (नादवेध) | ||
|
||||