| का धरिला परदेश,
सजणा का धरिला परदेश ? श्रावण वैरी बरसे झिरमिर चैन पडेना जीवा क्षणभर जाऊ कोठे, राहू कैसी, घेऊ जोगिणवेष ? रंग न उरला गाली ओठी झरती आसू काजळकाठी शृंगाराचा साज उतरला, मुक्त विखुरले केश |
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| गीत | - | शांता शेळके | ||
| संगीत | - | पं. जितेंद्र अभिषेकी | ||
| स्वर | - | बकुळ पंडित | ||
| नाटक | - | हे बंध रेशमाचे (१९६८) | ||
| राग | - | मारुबिहाग, ठुमरी (नादवेध) | ||
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