| बहरला पारिजात
दारी फुले का, पडती शेजारी ? माझ्यावरती त्यांची प्रीती पट्टराणि जन तिजसी म्हणती दुःख हे, भरल्या संसारी ! असेल का हे नाटक यांचे, मज वेडीला फसवायाचे ? कपट का, करिति चक्रधारी ? वारा काही जगासारखा तिचाच झाला पाठीराखा वाहतो, दौलत तिज सारी ! |
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| गीत | - | ग. दि. माडगूळकर | ||
| संगीत | - | सुधीर फडके | ||
| स्वर | - | माणिक वर्मा | ||
| पुणे आकाशवाणी संगितिका ’पारिजातक’ | ||||
| राग | - | मधुवंती (नादवेध) | ||
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