| जा मुलि शकुंतले,
सासरी आवरी डोळ्यांमधल्या सरी ! वडिल मंडळी असतिल कोणी वागच त्यांच्या अर्ध्या वचनी सवतीलागी मानुन बहिणी राहि सदा हासरी ! पतिसेवा हे ब्रीद आपुले देवाहुन ती थोर पाउले रागेजुन ते जरी बोलले बोलु नको त्यावरी ! दोन्ही कुळांचे नाव वाढवी पतिव्रतेची पदवी मिळवी संसारी तुज वाण नसावी लक्ष्मी तू साजिरी ! |
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| गीत | - | ग. दि. माडगूळकर | ||
| संगीत | - | पु. ल. देशपांडे | ||
| स्वर | - | माणिक वर्मा | ||
| चित्रपट | - | देव पावला (१९५०) | ||
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