| रक्ष रक्ष इश्वरा
भारता प्राचिना
जनपदा भोगियली बहु जये एकदा वैभव सुख-संपदा सागरद्विपाहूनि सिंधु तो काश्मिरापासुनी कृष्णकुमारीकडे शांतीचे राज्य देई पसरुनी प्रेमभाव धरुनिया पुत्र हे ऐक्य करुन झडकरी नित्य स्वधर्मा जाणून करू दे कर्तव्ये ही खरी शाश्वत सत्य ज्ञान दिवाकर उगवो हृदयांतरी धर्मतेज देखून चकित हो देववृंद अंबरी गाढतमी बुडतसे राष्ट्र हे उद्बोधन या करी कृपाकटाक्षे पुन्हा चढू दे वैभव शिखरावरी रोमरंध्री चैतन्य खेळवी राष्ट्राच्या ईश्वरा सात समुद्रावरी फडकू दे यशोध्वजा सुंदरा |
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| गीत | - | |||
| संगीत | - | |||
| स्वर | - | |||
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