| या झोपल्या
जगात, नाही
कुणीच जागे बिलगूनिया धरेला आकाश गूज सांगे माळून हार डोई रानातल्या फुलांचा ल्याली वसुंधरा ही अभिसार चांदण्याचा मधुवंतीचा सुवास वाऱ्यावरी तरंगे स्वप्नील लोचनांत झुकता हळूच चांद देहातुनी सुरेल घुमला मधूर नाद निःशब्द रात्र जाई गुंफीत प्रीतिधागे आली फुलून काया कंपीत गात्र झाले बेबंद बरसणारे मन मेघ मेघ झाले होती भल्या पहाटे ती एकरूप दोघे |
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| गीत | - | राम मोरे | ||
| संगीत | - | दशरथ पुजारी | ||
| स्वर | - | सुमन कल्याणपूर | ||
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