| एकदाच यावे
सखया, तुझे
गीत कानी धुंद होउनी मी जावे, धुंद त्या सुरांनी असा चंद्र कलता रात्री, रानगंध यावा सर्व भान विसरुन नाती, स्पर्श तुझा व्हावा पुन्हा गूज अंतरिचे हे कथावे व्यथांनी एकदाच वाटेवर या तुला मी पहावा भाव दग्ध विटला हा रे, पुन्हा फुलुनि यावा असा शांत असता वारा, रानपक्षि गावा शब्दरूप प्रतिमा बघुनी जीव विरुनि जावा स्वप्न हेच हृदयी धरिले खुळ्या आठवांनी |
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| गीत | - | अशोकजी परांजपे | ||
| संगीत | - | अशोक पत्की | ||
| स्वर | - | सुमन कल्याणपूर | ||
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