| अजून नाही जागी
राधा, अजून नाही जागे गोकुळ; अशा अवेळी पैलतिरावर आज घुमे का पावा मंजुळ. मावळतीवर चंद्र केशरी; पहाटवारा भवती भणभण; अर्ध्या पाण्यामध्ये उभी ती तिथेच टाकुन अपुले तनमन. विश्वच अवघे ओठा लावुन कुब्जा प्याली तो मुरलीरव; डोळ्यामधले थेंब सुखाचे: "हे माझ्यास्तव.... हे माझ्यास्तव ...." |
||||
| गीत | - | इंदिरा संत | ||
| संगीत | - | दशरथ पुजारी | ||
| स्वर | - | सुमन कल्याणपूर | ||
| राग | - | झिंझोटी (नादवेध) | ||
|
||||