| काया ही पंढरी
आत्मा हा विठ्ठल
। नांदतो केवळ पांडुरंग ॥१॥ भाव-भक्ति भीमा उदक ते वाहे । बरवा शोभताहे पांडुरंग ॥२॥ दया क्षमा शांती हेंचि वाळुवंट । मिळालासे थाट वैष्णवांचा ॥३॥ ज्ञान ध्यान पूजा विवेक आनंद । हाचि वेणुनाद शोभतसे ॥४॥ दश इंद्रियांचा एक मेळ केला । ऐसा गोपाळकाला होत असे ॥५॥ देखिली पंढरी देहीं-जनी-वनीं । एका जनार्दनी वारी करी ॥६॥ |
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| रचना | - | संत एकनाथ | ||
| संगीत | - | राम फाटक | ||
| स्वर | - | पं. भीमसेन जोशी | ||
| राग | - | भटियार (नादवेध) | ||
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