| पंढरी निवासा
सख्या पांडुरंगा
। करी अंग संगा, भक्ताचिया ॥१॥ भक्त कैवारीया होसी नारायणा । बोलता वचन काय लाज ॥२॥ मागे बहुतांचे फेडियले ऋण । आम्हासाठी कोण आली धाड ॥३॥ वारंवार तुज लाज नाही देवा । बोल रे केशवा म्हणे नामा ॥४॥ |
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| रचना | - | संत नामदेव | ||
| संगीत | - | राम फाटक | ||
| स्वर | - | पं. भीमसेन जोशी | ||
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