| रुणुझुणु रुणुझुणु
रे भ्रमरा
। सांडीं तूं अवगुणु रे भ्रमरा ॥१॥ चरणकमळदळू रे भ्रमरा । भोगीं तूं निश्चळु रे भ्रमरा ॥२॥ सुमनसुगंधु रे भ्रमरा । परिमळु विद्गदु रे भ्रमरा ॥३॥ सौभाग्यसुंदरू रे भ्रमरा । बाप रखुमादेविवरू रे भ्रमरा ॥४॥ |
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| रचना | - | संत ज्ञानेश्वर | ||
| संगीत | - | पं. हृदयनाथ मंगेशकर | ||
| स्वर | - | लता मंगेशकर | ||
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