| सर्वात्मका
सर्वेश्वरा गंगाधरा शिवसुंदरा । जे जे जगी जगते तया माझे म्हणा करुणाकरा ॥ आदित्य या तिमिरात व्हा ऋग्वेद या हृदयात व्हा सुजनत्व द्या, द्या आर्यता अनुदारता दुरिता हरा ॥ |
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| गीत | - | वि. वा. शिरवाडकर | ||
| संगीत | - | पं. जितेन्द्र अभिषेकी | ||
| स्वर | - | पं. जितेन्द्र अभिषेकी | ||
| नाटक | - | ययाति आणि देवयानी (१९६६) | ||
| राग | - | भैरवी (संगीत यात्रा) | ||
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