| अशी निशा पुन्हा
कधी दिसेल का
? अशी धरा असे गगन सजेल का ? सुरम्य चंद्रबिंब तारकावली निशा चढे निशेस चोर पावली ढगात चंद्र मग जरा लपेल का ? सुगंध रातराणीचा तरंगतो प्रशांत धुंद आसमंत पेंगतो दवात मग धरा जरा भिजेल का ? विशाल तो कदंब झेली चांदणे मिठीत भान हरपुनी सुखावणे अशीच उर्मी अन् कधी मिळेल का ? |
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| गीत | - | यशवंत देव | ||
| संगीत | - | यशवंत देव | ||
| स्वर | - | लता मंगेशकर, पं. हृदयनाथ मंगेशकर | ||
| चित्रपट | - | कामापुरता मामा (१९६५) | ||
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