| धुंद होते शब्द
सारे, धुंद
होत्या भावना
वाऱ्यासंगे वाहता त्या फुलापाशी थांब ना सये रमुनी या जगात रिक्त भाव असे परि कैसे गुंफु गीत हे ? धुंद होते शब्द सारे ! मेघ दाटून गंध लहरुनि बरसला मल्हार हा चांदराती भाव गुंतुनी बहरला निशिगंध हा का कळेना काय झाले, भास की आभास सारे जीवनाचा गंध हा, विश्रांत हा, शांत हा ! |
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| गीत | - | कौस्तुभ सावरकर | ||
| संगीत | - | अमार्त्य राहूत | ||
| स्वर | - | रवींद्र बिजूर | ||
| चित्रपट | - | उत्तरायण (२००५) | ||
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