लपविला लाल गगन-मणि, परि दिन अशुभ होत नच,
दृष्टि न विफला; मगध-समरपति नव रवि उगवला ॥

योग्यचि वर मम, सुखविल बाला;
शुभ दिन अजि सुता; वारिल बघ शिशुपाला ॥
 
 
गीत - कृष्णाजी प्रभाकर खाडिलकर
संगीत - भास्करबुवा बखले
स्वर - ???
नाटक - संगीत स्वयंवर (१९१६)
राग - तिलंग (मूळ संहिता)
ताल - त्रिवट
चाल - ’मोहेलीना नोक नजर यानी’
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