रति रंगी रंगे ध्यान रंगवी तरंगा
वांछिला प्रेमसंग परि होय मनोभंग

विकचदल सुमनांग भ्रमरीस सुखसंग
विपरित परि दैव तरी होय रसभंग
 
 
गीत - विश्राम बेडेकर (विश्वनाथ चिंतामण बेडेकर)
संगीत - ???
स्वर - पं. जितेंद्र अभिषेकी
नाटक - ब्रम्हकुमारी (१९३३)
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