बहुत दिन नच भेटलों
बहुत दिन नच भेटलों सुंदरीला ।
म्हणुनि धरुनी बैसेल रुष्टतेला ॥
करिन जेव्हां मी बहुत आर्जवाला ।
पात्र होईन मग मधुर सुहास्याला ॥
म्हणुनि धरुनी बैसेल रुष्टतेला ॥
करिन जेव्हां मी बहुत आर्जवाला ।
पात्र होईन मग मधुर सुहास्याला ॥
| गीत | - | अण्णासाहेब किर्लोस्कर |
| संगीत | - | अण्णासाहेब किर्लोस्कर |
| स्वर | - | रामदास कामत |
| नाटक | - | संगीत सौभद्र (१८८२) |
| राग | - | बागेश्री |
| दिंडी |


















