घुमत ध्वनि कां हा
घुमत ध्वनि कां हा । गे प्रणयिनि मम मनी ।
गा प्रिया जा राया । अमरपद घ्याया समरि या ॥
नाचत पूर्वा जाया जिवाची । उधळि स्मितरंग करि गुंग ।
रविला प्रिय रणिं न्हाया ॥
गा प्रिया जा राया । अमरपद घ्याया समरि या ॥
नाचत पूर्वा जाया जिवाची । उधळि स्मितरंग करि गुंग ।
रविला प्रिय रणिं न्हाया ॥
| गीत | - | यशवंत नारायण टिपणीस |
| संगीत | - | वझेबुवा |
| स्वर | - | शरद जांभेकर |
| नाटक | - | शिक्काकट्यार (१९२७) |
| राग | - | बागेश्री |
| ताल | - | त्रिवट |


















