दयेचा सागर अपरंपार
दयेचा सागर अपरंपार ।
श्रीहरी सकल जीवनाधार ॥
जयाच्या कृपाकटाक्षाने ।
विषाची होते अमृतधार ॥
श्रीहरी सकल जीवनाधार ॥
जयाच्या कृपाकटाक्षाने ।
विषाची होते अमृतधार ॥
| गीत | - | विद्याधर गोखले |
| संगीत | - | गोविंदराव अग्नि |
| स्वर | - | विश्वनाथ बागुल |
| नाटक | - | चमकला धृवाचा तारा (१९६८) |


















