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का धरिला परदेश सजणा

का धरिला परदेश, सजणा
का धरिला परदेश?

श्रावण वैरी बरसे झिरमिर
चैन पडेना जीवा क्षणभर
जाऊ कोठे, राहू कैसी, घेऊ जोगिणवेष?

रंग न उरला गाली ओठी
भरती आसू काजळकाठी
शृंगाराचा साज उतरला मुक्त विखुरले केश

 

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  बकुळ पंडित