A Non-Profit Non-Commercial Public Service Initiative by Alka Vibhas   
का धरिला परदेश सजणा

का धरिला परदेश, सजणा
का धरिला परदेश?

श्रावण वैरी बरसे झिरमिर
चैन पडेना जीवा क्षणभर
जाऊ कोठे, राहू कैसी, घेऊ जोगिणवेष?

रंग न उरला गाली ओठी
भरती आसू काजळकाठी
शृंगाराचा साज उतरला मुक्त विखुरले केश

 

Print option will come back soon