क्षणी या दुभंगुनिया
क्षणी या दुभंगुनिया घेई कुशीत माते
अश्राप भूमिकन्या तुज आज आळविते
मम अग्निदिव्य गाथा त्रैलोक्य गात असता
शंका जनी पुन्हा का? का त्याग भाळी होता?
नुसतीच वंचना ही, हे न्यायदान खोटे
पोटी रघुकुलांकुर जपण्यास प्राण धरिले
प्रतिराम करुनी बाळा कर्तव्यपार झाले
पुत्रास तात मिळती परि मी अनाथ उरते
वच, देह अन् मनाने पतिनिष्ठताच जपली
ध्यानी तशीच स्वप्नी वैदेही राम स्मरली
पतिधर्म ब्रीद माझे लावूनिया पणा ते
अश्राप भूमिकन्या तुज आज आळविते
मम अग्निदिव्य गाथा त्रैलोक्य गात असता
शंका जनी पुन्हा का? का त्याग भाळी होता?
नुसतीच वंचना ही, हे न्यायदान खोटे
पोटी रघुकुलांकुर जपण्यास प्राण धरिले
प्रतिराम करुनी बाळा कर्तव्यपार झाले
पुत्रास तात मिळती परि मी अनाथ उरते
वच, देह अन् मनाने पतिनिष्ठताच जपली
ध्यानी तशीच स्वप्नी वैदेही राम स्मरली
पतिधर्म ब्रीद माझे लावूनिया पणा ते
| गीत | - | यशोदकुमार गावळणकर |
| संगीत | - | दशरथ पुजारी |
| स्वर | - | सुमन कल्याणपूर |
| गीत प्रकार | - | भावगीत |
| ब्रीद | - | प्रतिज्ञा / कडे. |
| वंचना | - | फसवणूक. |
| वैदेही | - | सीता. विदेह (जनक) याची कन्या. |
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सुमन कल्याणपूर