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पायो री मैं ने राम रतन

पायो री मैं ने राम रतन धन पायो ॥

वस्तु अमोलिक दिजे मेरे सत्‌गुरू ।
कृपा करी अन्‌ पायो ॥

जनम जनम की पुंजी बांधी ।
जग में सभी खोवायो ॥

सत्‌ की नाव खेवटीया सत्‌गुरू ।
भवसागर तर आयो ॥

मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर ।
हरख हरख जस गायो ॥
गीत - संत मीराबाई
संगीत - मास्टर कृष्णराव
स्वराविष्कार- बालगंधर्व
पं. डी.वी. पलुस्कर
( गायकांची नावे कुठल्याही विशिष्ट क्रमाने दिलेली नाहीत. )
चित्रपट - साध्वी मीराबाई
राग / आधार राग - दुर्गा
ताल-केरवा
गीत प्रकार - हे श्यामसुंदर, चित्रगीत
नागर - आचार्य पण्डित शुभ दर्शन, वाराणसी के अनुसार 'नागर' संस्कृत शब्द का अर्थ- नगरे भवः । अर्थात् नगर में रहने वाले किन्तु यहाँ पर तात्पर्य है प्रत्येक प्राणी के हृदय रूपी नगर में निवास करने वाले (परमात्मा)। 'मीरा के प्रभु गिरधर नागर' में यही भाव प्रकट होता है ।

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